फिल्म रिव्यु - Ek Din
‘एक दिन’ एक ऐसी फिल्म है जो बड़े दावों के साथ नहीं आती, बल्कि छोटे-छोटे लम्हों में प्यार को दिखाने की कोशिश करती है। यह परफेक्ट नहीं है, लेकिन इसकी सच्चाई और सादगी इसे एक बार देखने लायक जरूर बनाती है।
आज के दौर में जहां लव स्टोरीज़ अक्सर बड़े ड्रामे, ट्विस्ट और हाई-वोल्टेज इमोशन्स के सहारे चलती हैं, वहीं Ek Din एक बेहद सादगी भरी और शांत प्रेम कहानी लेकर आती है। यह फिल्म 2016 की थाई फिल्म One Day की आधिकारिक रीमेक है, और उसी इमोशनल बेस को हिंदी दर्शकों के लिए पेश करती है। यह फिल्म उन एहसासों को पकड़ने की कोशिश करती है, जो अक्सर कहे नहीं जाते—बस महसूस किए जाते हैं। फिल्म का निर्देशन सुनील पांडे ने किया है, जबकि इसे आमिर खान, मंसूर खान और अपरना पुरोहित ने प्रोड्यूस किया है।
कहानी की झलक
फिल्म की कहानी दिनेश (Junaid Khan) और मीरा (Sai Pallavi) के इर्द-गिर्द घूमती है। दिनेश एक ऐसा लड़का है, जो हमेशा बैकग्राउंड में रह जाता है—ना ज्यादा दोस्त, ना कोई खास पहचान। लेकिन उसके दिल में मीरा के लिए गहरा प्यार है, जिसे वह कभी कह नहीं पाता।
मीरा की दुनिया बिल्कुल अलग है। वह अपने बॉस नकुल (Kunal Kapoor) के प्यार में उलझी हुई है, जो उसे झूठी उम्मीदों में रखता है। जब सच सामने आता है, तो मीरा की जिंदगी एक झटके में बदल जाती है। इसके बाद एक हादसा और फिर एक ऐसी मेडिकल कंडीशन—Transient Global Amnesia—कहानी को एक अलग मोड़ दे देती है, जहां हर दिन एक नई शुरुआत जैसा हो जाता है।
कैसी है फिल्म?
‘एक दिन’ की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी है, लेकिन यही इसकी कमजोरी भी बन जाती है। फिल्म बिना किसी बड़े ड्रामे के धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, जो कुछ दर्शकों को बहुत रिलेटेबल लगेगा, लेकिन कुछ को यह रफ्तार धीमी महसूस हो सकती है।
पहला हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ लगता है, जैसे कहानी बस सेटअप कर रही हो। असली भावनाएं और कनेक्शन फिल्म के दूसरे हिस्से में सामने आते हैं, जहां दिनेश और मीरा के बीच के छोटे-छोटे पल दिल को छूते हैं।
हालांकि, फिल्म का जो सबसे दिलचस्प आइडिया है—हर दिन याददाश्त खोना—उसे और गहराई से दिखाया जा सकता था। कई जगह यह सिर्फ एक प्लॉट डिवाइस बनकर रह जाता है, बजाय इसके कि कहानी की आत्मा बन सके।
तकनीकी पक्ष
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी बेहद खूबसूरत है। खासकर जापान के लोकेशन्स को जिस तरीके से कैद किया गया है, वो स्क्रीन पर एक अलग ही फील देता है।
म्यूजिक ठीक-ठाक है—सुनने में मधुर, लेकिन थिएटर से बाहर निकलते ही याद रह जाए ऐसा नहीं।
एक्टिंग
- जुनैद खान ने अपने किरदार को बहुत ही सादगी से निभाया है। उनका अभिनय ओवरड्रामेटिक नहीं लगता, जो इस रोल के लिए सही है।
- साई पल्लवी फिल्म की जान हैं। उनका नैचुरल एक्सप्रेशन और इमोशनल कनेक्ट कहानी को मजबूती देता है।
- कुणाल कपूर अपने रोल में ठीक लगते हैं, लेकिन उनका किरदार थोड़ा और असरदार हो सकता था।
देखनी चाहिए या नहीं?
अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो धीरे-धीरे दिल में उतरती हैं, जहां लव स्टोरी शोर नहीं मचाती बल्कि चुपचाप महसूस होती है—तो ‘एक दिन’ आपके लिए है। लेकिन अगर आप तेज रफ्तार और ज्यादा ड्रामेटिक कंटेंट चाहते हैं, तो शायद यह फिल्म आपको पूरी तरह संतुष्ट न कर पाए।
निष्कर्ष:
‘एक दिन’ एक ऐसी फिल्म है जो बड़े दावों के साथ नहीं आती, बल्कि छोटे-छोटे लम्हों में प्यार को दिखाने की कोशिश करती है। यह परफेक्ट नहीं है, लेकिन इसकी सच्चाई और सादगी इसे एक बार देखने लायक जरूर बनाती है।